नक्सल प्रभावित बस्तर में लोगों में मतदान को लेकर काफी उत्साह है। यह
बात वोटर जागरूकता अभियान में सामने आई। इस दौरान यहां के लोगों ने बीजापुर
और सुकमा कलेक्टर को बताया कि वोट डालने के दौरान उंगली पर स्याही न लगाई
जाए, वरना उसे देखकर नक्सली मार देंगे। हम वोटिंग करना चाहते हैं, लेकिन
नक्सलियों का डर है।
अफसरों ने चुनाव आयोग से इस मामले में गाइडलाइंस बनाने और समाधान
निकालने को कहा है। इनका मानना है कि अगर ऐसा होता है, तो बस्तर में मतदान
में इजाफा होगा। बस्तर की 12 सीटों पर पहले चरण में 12 नवंबर को मतदान होना है। अफसरों से मिले सुझाव के बाद चुनाव आयोग इस पर विचार कर रहा है। पिछले
चुनावों की तरह इस बार भी माओवादी संगठनों ने बस्तर में चुनाव के बहिष्कार की घोषणा की है। इसके लिए जगह-जगह पोस्टर भी लगाए गए हैं।
हाथ चेक करते हैं नक्सली: मतदान के बाद नक्सली
गांव-गांव में लोगों के हाथ चेक करते हैं। किसी के हाथ पर स्याही मिले तो
परेशान किया जाता है, हत्या तक करने के मामले सामने आए हैं। इसलिए ग्रामीण
वोटिंग में हिस्सा ही नहीं लेते। बीते चुनावों में बस्तर के अंदरूनी जिले
सुकमा, बीजपुर, दंतेवाड़ा और नारायणपुर में 100 से अधिक ऐसे बूथ सामने आए
थे, जिनमें वोटिंग 1 फीसदी से कम रही।
री-पोल को जीत बताते हैं : बेहद कम वोटिंग होने पर
आयोग ऐसे केंद्रों को नक्सल प्रभाव वाले मानकर री-पोल कराता है और नक्सली
इसे जीत के रूप में प्रचारित करते हैं। इसी माहौल को बनाए रखने के लिए इस
बार भी माओवादियों ने चुनाव बहिष्कार की घोषणा की है। वहीं, अफसर बस्तर के
भीतरी इलाकों में जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को मतदान करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
मतदान के दिन ही फैसला लेंगे : सीईओ सुब्रत साहू का
कहना है कि नक्सल क्षेत्र में वोटर की उंगली पर स्याही न लगाने का सुझाव
आया है। यह मामला अभी विचाराधीन है, आयोग मतदान की तारीख के समय ही अंतिम
फैसला लेगा।क्सल क्षेत्र में राज्य की 21 सीटें: बिलाईगढ़,
बिंद्रानवागढ़, डौंडीलोहारा, कवर्धा, गुंडरदेही, पंडरिया, खैरागढ़,
डोंगरगांव, मोहला-मानपुर, अंतागढ़, भानुप्रतापपुर, कांकेर, केशकाल,
कोंडागांव, कोंटा, नारायणपुर, बस्तर, जगदलपुर, चित्रकोट, दंतेवाड़ा और
बीजापुर।
औसत वोटिंग 2% कम : छत्तीसगढ़ के नक्सल
प्रभावित इलाकों में मैदानी इलाकों के मुकाबले औसत वोटिंग 2% कम रहती
थी। 2013 के चुनाव से छह महीने पहले झीरम में कांग्रेस नेताओं की हत्या के
बाद इन इलाकों में वोटिंग सामान्य से करीब 6% कम हुई। छत्तीसगढ़ बनने से
पहले इन इलाकों में कांग्रेस की पैठ थी। 2003 में यह क्षेत्र भाजपा के गढ़
बन गए, अब फिर से कांग्रेस के पास हैं। यहां कांग्रेस की 9 सीटें बढ़ीं,
भाजपा की आधी रह गईं। सात सीटें ऐसी थीं, जहां पिछले चुनाव में 80% से
ज्यादा वोटिंग हुई। नक्सल प्रभावित छह सीटों पर किसी एक पार्टी को दोबारा
नहीं चुना गया।अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने ग्लोबल ग्रोथ अनुमान 0.2% घटाकर
3.7% कर दिया है। लेकिन, चालू वित्त वर्ष (2018-19) में भारत के लिए 7.3%
पर बरकरार रखा है। हालांकि, अगले साल (2019-20) के लिए भारत की विकास दर
7.4% रहने की उम्मीद जताई है। आईएमएफ ने अप्रैल में 7.5% का अनुमान जारी
किया था।
आईएमएफ के मुताबिक कच्चा तेल महंगा होने और दुनिया के कई देशों
की वित्तीय हालत बिगड़ने का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। इसलिए
अगले साल के लिए ग्रोथ अनुमान में कमी की गई। फिर भी भारत की विकास दर
दुनिया में सबसे तेज रहेगी।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का मानना है कि भारत नोटबंदी और जीएसटी के असर
से उबर चुका है। देश में निवेश बढ़ रहा है और निजी क्षेत्र में खपत बढ़ी
है। मीडियम टर्म में भारत की विकास दर 7.75% रहने की उम्मीद है। इसे आर्थिक
सुधारों से फायदा होगा। हालांकि, अप्रैल में आईएमएफ ने 7.80% की उम्मीद जताई थी।
देश में इस साल महंगाई दर 3.6% रह सकती है। जबकि, अगले साल 4.7% रहने का
अनुमान है। आईएमएफ का मानना है कि तेल की बढ़ती कीमतों की वजह से महंगाई
दर में बढ़ोतरी होगी।
आईएमएफ ने चालू वित्त वर्ष में अमेरिका, चीन और भारत की विकास दर के अनुमान में बदलाव नहीं किया। लेकिन, अगले साल (2019-20) के लिए भारत और
अमेरिका का ग्रोथ अनुमान 0.1% जबकि चीन का 0.2% घटा दिया।
वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका के ट्रेड वॉर से चीन
की विकास दर पर असर पड़ेगा। ग्लोबल ग्रोथ रेट के अनुमान में भी अमेरिका और
दूसरे देशों के बीच व्यापार विवादों की वजह से कमी की गई है। दुनियाभर में
आर्थिक गतिविधियों पर ग्लोबल ट्रेड वॉर का नकारात्मक असर हुआ है।
मेरठ. उत्तरप्रदेश के सरधना से भाजपा विधायक संगीत सोम
के घर पर अज्ञात हमलावरों ने कई राउंड फायरिंग की और ग्रेनेड फेंका। घटना
बुधवार रात करीब एक बजे हुई। तब सोम परिवार के साथ घर में मौजूद थे। हमलावर
कार में सवार थे। इस घटना के बाद विधायक की सुरक्षा बढ़ाई गई है।
मेरठ के एसएसपी देर रात घटना स्थल पर पहुंचे। उन्होंने बताया कि खाली कारतूस और गोलियों के निशान की फॉरेंसिक जांच कराई
जा रही है। एक हैंड ग्रेनेड मिला है, जो फटा नहीं था। गार्ड के केबिन और
मेनगेट को निशाना बनाकर गोलियां चलाई गई हैं।
संगीत सोम ने कहा, ''मुझे किसी से धमकी नहीं
मिली। लेकिन दो साल पहले किसी ने फोन पर कहा था कि तुम पर ग्रेनेड से हमला
किया जाएगा।'' विधायक सोम अपने बयानों से विवादों में रहे हैं। उन्हें जेड श्रेणी की सुरक्षा मिली हुई है।ई दिल्ली. सरकार ने बुधवार को 19 आइटम्स पर कस्टम
ड्यूटी बढ़ाने का ऐलान किया। इसके चलते रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर और वॉशिंग
मशीन महंगी होंगी। सरकार ने यह फैसला चालू खाता घाटा (सीएडी) कम करने और
गैर-जरूरी चीजों का आयात घटाने के लिए किया है। एविएशन टर्बाइन फ्यूल
(एटीएफ) पर पहली बार कस्टम ड्यूटी लगाई गई है। ऐसे में हवाई सफर भी महंगा
हो सकता है।
राजस्व विभाग के नोटिफिकेशन के मुताबिक, बुधवार आधी रात से ही यह फैसला लागू हो गया। जिन 19 आइटम्स पर कस्टम ड्यूटी घटाई गई है, 2017-18 में उनका
86 हजार करोड़ रुपए का आयात हुआ था।
मोदी ने दिए थे चालू खाता घाटा कम करने के निर्देश
रुपए की गिरती कीमत और तेजी से बाहर जाते विदेशी करंसी के मद्देनजर पिछले
हफ्ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उच्चस्तरीय बैठक बुलाई थी। इसमें मोदी
ने चालू खाता घाटा कम करने के लिए गैर-जरूरी चीजों को आयात कम करने को कहा
था। एयर कंडीशनर, घरेलू रेफ्रिजरेटर और वॉशिंग मशीन का आयात शुल्क 10 से
20% किया जा चुका है।टना. बिहार में कांग्रेस नेताओं का एक होर्डिंग चर्चा में है। इसमें राहुल गांधी और प्रदेश की नवनियुक्त कार्यसमिति के सदस्यों
की तस्वीरें हैं। हर तस्वीर पर संबंधित नेता की जाति लिखी हुई है। कांग्रेस
के पूर्व प्रदेश सचिव ने यह होर्डिंग लगवाया है। उनकी दलील है कि
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस को मुस्लिमों की पार्टी कहा है, उसका यह जवाब है।
पटना में सदाकत आश्रम, राजापुर पुल, तारामंडल
और बोरिंग केनाल रोड समेत कई जगहों पर यह होर्डिंग लगाए गए हैं। प्रदेश
कांग्रेस के पूर्व प्रदेश सचिव सिद्धार्थ क्षत्रिय ने इन्हें लगवाया है।
उनका कहना है कि मोदी कह रहे हैं कि कांग्रेस
मुसलमानों की पार्टी है। ऐसे में हम उन्हें और जनता को बताना चाहते हैं कि
ऐसा कतई नहीं है।नई प्रदेश कमेटी में सभी जाति को स्थान मिला है।
होर्डिंग में राहुल गांधी की तस्वीर पर ब्राह्मण
लिखा गया है। अखिलेश सिंह और श्याम सुंदर सिंह धीरज भूमिहार हैं। बिहार प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल, वीरेंद्र सिंह राठौर और समीर सिंह राजपूत हैं।
अल्पेश ठाकुर और सदानंद सिंह पिछड़ा वर्ग से हैं।
हाल ही में प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष के साथ
चार कार्यकारी अध्यक्ष और अभियान समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति हुई है।
एक साल से प्रभारी अध्यक्ष के भरोसे प्रदेश कांग्रेस चल रही थी। इसी के साथ
बड़ी कमेटी भी बनाई गई है।
के आम चुनावों के पहले होने वाली भारतीय जनता पार्टी की आखिरी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक दिल्ली में ख़त्म हुई.
मौजूदा
अध्यक्ष अमित शाह को चुनाव तक सेनापति बने रहने का दायित्व मिला और समापन
के पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने "एक नए भारत का संकल्प लिया.''
इस अहम बैठक में ऐसे कई लोग भी पहुंचे जो पार्टी में पिछले चार सालों से ख़ासे 'निष्क्रय' दिखाई दिए हैं.
लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की तस्वीर 2018 की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में एक साथ ही दिखी.
2013 में पणजी, गोवा में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी 'अस्वस्थ' होने के चलते नहीं गए थे.
मुरली मनोहर जोशी उस बैठक के लिए गोवा गए थे और उन्होंने भाजपा की लीडरशिप को बदलते देखा था.
ये वही बैठक थी जिसमें नरेंद्र मोदी को 2014 के आम चुनावों के लिए चुनाव प्रचार समिति का प्रमुख बनाया गया.
इसके बाद से जो हुआ वो ज़्यादा पुराना इतिहास नहीं है. नरेंद्र मोदी ने धुआंधार तरीके से चुनाव जीता और पीएम बने.
उनके पुराने और 'विश्वासपात्र' गृह मंत्री रहे अमित शाह को भाजपा की
कमान सौंपी गई और बिहार-दिल्ली छोड़ भाजपा ने देश में तमाम विधानसभा चुनाव जीते.
लेकिन इस प्रक्रिया में तीन लोग ऐसे भी थे जो पार्टी से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से दूर जा रहे थे.
पटना साहिब से सांसद शत्रुघ्न सिन्हा, पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा और सुल्तानपुर के सांसद और संजय गाँधी के बेटे वरुण गाँधी.
लंबे
समय तक मोदी सरकार की वित्तीय और विदेश नीति को ग़लत ठहराने के बाद मौजूदा
केंद्रीय राज्य मंत्री जयंत सिन्हा के पिता यशवंत सिन्हा ने इसी वर्ष
भाजपा त्याग दी.
लेकिन दो ऐसे लोग हैं जिनके बारे में भारतीय जनता पार्टी आज भी असमंजस में है.
वरुण गांधी और शत्रुघ्न सिन्हा क्यों नहीं नज़र आए
वरुण गाँधी और शत्रुघ्न सिन्हा वे दो सांसद हैं जिनका पार्टी में भविष्य किसी को नहीं पता.
राष्ट्रीय
कार्यकारिणी के दौरान भाजपा के एक केंद्रीय नेता ने कहा, "आज भाजपा जितनी
सफल और बड़े पैमाने पर फैली हुई है उसमें बेवजह विरोध करने वालों के लिए
जगह कहाँ है?"
लेकिन जिस शाम अमित शाह राष्ट्रीय कार्यकारिणी में
"बूथ जीतो, चुनाव जीतो" वाला मंत्र दोहरा रहे थे, उस समय शत्रुघ्न सिन्हा
और यशवंत सिन्हा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के बगल में बैठे
हुए आम आदमी पार्टी की एक रैली में शिरकत कर रहे थे.
इसके एक शाम
पहले भाजपा सरकार की केंद्रीय मंत्री मेनका गाँधी के पुत्र और सांसद वरुण
गाँधी अम्बाला की एक यूनिवर्सिटी में छात्रों को युवा शक्ति पर भाषण दे रहे
थे.
भाजपा को लंबे समय से कवर कर रहे वरिष्ठ पत्रकार शेखर अय्यर के मुताबिक़, "पार्टी इन्हें हीरो बनाने के मूड में बिल्कुल नहीं है".
उन्होंने
कहा, "यशवंत सिन्हा तो ख़ुद अलग हो गए. शत्रुघ्न सिन्हा कभी आप तो कभी
आरजेडी वगैरह के साथ दिखते हैं और सरकार के ख़िलाफ़ कुछ बोल जाते हैं. वरुण
खुल कर तो कुछ नहीं बोलते, लेकिन थोड़ा अलग-थलग ज़रूर दिखते हैं. असल बात
ये है कि भाजपा दोनों में से किसी के ख़िलाफ़ एक्शन लेकर उन्हें हीरो नहीं
बनाना चाहती."
शेखर अय्यर को लगता है पार्टी का रवैया अगले आम चुनाव में "टिकट देते समय सबको साफ़ तौर पर दिख जाएगा".
बात शत्रुघ्न सिन्हा की हो तो वे एक लंबे समय से प्रधानमंत्री मोदी और
उनकी कैबिनेट के ख़िलाफ़ 'मसखरी भरे' लेकिन चुभने वाले ट्वीट करते रहे हैं.
मिसाल के तौर पर संसद सत्र के दौरान मोदी की विदेश यात्रा पर
उन्होंने ट्वीट किया था, "आसमान फट नहीं जाता अगर पीएम संसद सत्र पूरा होने
के बाद अफ़्रीका जाते."
कर्नाटक विधान सभा चुनाव के दौरान उन्होंने कहा था कि, "प्रधानमंत्री बनने से कोई देश का सबसे ज्ञानी नहीं बन जाता."
ऐसे
दर्जनों उदाहरण मिल जाएंगे जिनका निष्कर्ष यही निकलता है कि मौजूदा भाजपा
में न तो शत्रुघ्न सिन्हा के लिए कोई ख़़ास जगह है और न ही शत्रुघ्न सिन्हा
के दिल में मौजूदा भाजपा नेतृत्व के प्रति.
रविवार को ही भाजपा के केंद्रीय मंत्री मुख़्तार अब्बास नक़वी ने सिन्हा को 'सभी का मंच शेयर कर लेने वाला' बताया.
हालाँकि
शत्रुघ्न सिन्हा से ही मिलता-जुलता एक उदाहरण पूर्व भाजपा सांसद नवजोत
सिंह सिद्धू भी हैं, लेकिन वे पार्टी छोड़ कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं
और फ़िलहाल पंजाब कैबिनेट में मंत्री हैं.
लौटते हैं वरुण गाँधी पर जिन्होंने नरेंद्र मोदी या अमित शाह की कभी भी खुलकर आलोचना नहीं की है.
लेकिन वरुण गाँधी के रवैये से हमेशा यही लगा है कि वे अपनी ही पार्टी की सरकार से नाख़ुश हैं.
वरिष्ठ
पत्रकार राधिका रामशेषन के मुताबिक़, "भाजपा में वरुण की जगह उस दिन से
सिमटनी शुरू हो गई थी जिस दिन से पार्टी नरेंद्र मोदी और अमित शाह के पूरे
प्रभाव में आई."
उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने हाल ही
में बताया था कि, @कुछ दिन पहले लखनऊ में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में वरुण
ने किसी शीर्ष नेता का नाम लिए बिना सरकारी नीतियों की धाज्जियाँ उड़ा दी
थीं.'
दरअसल वरुण ने अपने परदादा जवाहरलाल नेहरू की तारीफ़ करने के
अलावा देश में किसानों का ख़स्ताहाल और एक बड़े उद्योगपति का बैंक कर्ज़ा
चुकाए बिना देश से निकल जाने की निंदा की थी.
हालांकि भारतीय जनता
पार्टी ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी. वैसे भी 2017 की भाजपा
राष्ट्रीय कार्यकारिणी इलाहाबाद में हुई थी और पार्टी के कुछ नेताओं ने
मुझसे 'वरुण के मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल" होने की बात कही थी.
इलाहाबाद हवाई अड्डे से लेकर बैठक के स्थान तक रातोंरात वरुण गाँधी की मुख्यमंत्री पद की दावेदारी के पोस्टर भी लगे मिले थे.
जब चुनाव आए तो वरुण को "प्रचार तक के लिए नहीं कहा गया".
बहरहाल, रविवार को वरुण गाँधी से बात नहीं हो सकी
क्योंकि अम्बाला से लौटने के बाद उनकी 'तबीयत थोड़ी ढीली" है और सोमवार को
उन्हें एक और एक और सम्बोधन देने भोपाल निकलना है.
सवाल बड़ा लगता है कि आखिर वरुण और शत्रुघ्न भाजपा की इस अहम बैठक में क्यों नहीं गए.
शत्रुघ्न सिन्हा ने तो अरविन्द केजरीवाल के साथ मंच पर बैठ कर अपना जवाब फिर से देने की कोशिश की है.
वरुण शायद अगले आम चुनावों तक अपने पत्ते न खोलने का मन बनाकर बैठे हैं.
रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मामले में मीडिया का कोई भी मूल्यांकन ये मान कर शुरू होता है कि मोदी को मीडिया ने
बनाया है. नरेंद्र मोदी को अकेले आरएसएस नहीं बना सकता था.
मीडिया
ही था, जिसने सपने दिखाए और कहानियाँ सुनाईं. अमरीकी कॉमिक्स के प्रमुख
किरदार रोशैख़ (जो अपराध से लड़ता है और दोषियों को हर हाल में सज़ा देता
है) की तरह, जिससे लोगों को लगने लगा कि कांग्रेस में अब कुछ नहीं बचा है
और उसका विकल्प केवल मोदी ही हैं.
इसने एक ऐसे व्यक्ति की रूपरेखा
तैयार की, जो सक्रिय, साहसी, निर्णायक, सक्षम और कठोर था. वो एक
'इंप्रेशनिस्ट पेंटर' की तरह धीरे-धीरे उनकी एक जीवंत तस्वीर बनाते गए.
मोदी
दो दशकों पहले पूरी तरह एक अफ़वाह थे, धीरे-धीरे चर्चाओं का हिस्सा बन गए
और फिर मीडिया की रिपोर्टों ने पहले उनकी एक छवि बनाई. फिर उन्हें एक आइकन
या आदर्श में बदल दिया. नरेंद्र मोदी मीडिया की एक बहुत बड़ी खोज हैं.
मीडिया का मोदी से क्या संबंध है, इस सवाल को दूसरी तरह से पूछने की जरूरत है.
सवाल ये है कि मीडिया अपनी ही बनाई कृति को कैसे देखता है, जो अब प्रधानमंत्री बन चुकी है. इसका जवाब काफी चिंताजनक है. लोग मीडिया से
आलोचक, तथ्यात्मक और कम से कम संतुलित होने की उम्मीद तो करते हैं.
लेकिन
अफ़सोस है कि मीडिया मोदी का बहुत बड़ा फ़ैन है. मीडिया ने खुद के भीतर
झांकना ही छोड़ दिया है. जहां मीडिया को लोगों तक सच पहुंचाना चाहिए था और
आलोचक की भूमिका निभानी चाहिए थी वहीं वो मोदी के कट्टर राष्ट्रवाद की धुन
में व्यक्ति पूजा करने लगा है.
अख़बारों में मोदी पर छपी रिपोर्ट और विज्ञापन एक जैसे ही लगते हैं.
इससे लगता है कि मोदी भारत के किम इल संग बन गए हैं, जो उत्तर कोरिया के
पहले सर्वोच्च नेता थे. ऐसे नेता जिनसे कोई सवाल नहीं किया जाता.
शुरुआत
में किसी को भी नरेंद्र मोदी से सहानुभूति हो सकती है क्योंकि मीडिया ने
उन्हें एक ऐसे शख़्स के तौर पर दिखाया है, जो बाहरी और एक साधारण चाय वाला
होने के बावजूद भी दिल्ली के लुटियंस किले में दाखिल हुआ.
अब इस काल्पनिक कहानी का आकर्षण बनाए रखने के लिए इन बातों पर बार-बार ज़ोर दिया जाता है.
मीडिया
विरोधाभासी तरीक़े से दोनों बातें कहता है, एक तरफ़ तो वो कहता है कि मोदी
तो नए हैं, इसलिए उनका स्वागत करो, दूसरी तरफ़ वो उन्हें वक्त की पुकार
बताता है.
ऐसा लगता है जैसे 2019 के चुनावों की घोषणा हो चुकी है. ये हालात अमित
शाह को तो ख़ुश कर सकते हैं लेकिन मीडिया की संदेह और आलोचन करने और उसकी
जांच करने की भूमिका को पूरा नहीं करते हैं.
मीडिया इस तरह व्यवहार
करता है जैसे देश में मोदी के सिवा कुछ है ही नहीं. बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई जाने
वालीं ये ख़बरें मीडिया पर सवाल उठाती हैं और उसके विश्लेषण पर संदेह पैदा
करती हैं.
इस बात को साबित करने के लिए तीन-चार मामलों पर गौर करते हैं. पहला
मामला निश्चित तौर पर नोटबंदी से जुड़ा है. मीडिया ने इसे भारत में मनाए जा
रहे एक त्यौहार की तरह दिखाया.
हो सकता है कि मध्यम वर्ग ने शुरुआत
में इसे भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई समझते हुए ख़ुशी मनाई हो. लेकिन,
जल्द ही ये हक़ीक़त उनके सामने आ गई कि नोटबंदी अनौपचारिक अर्थव्यवस्था और
नगदी की ज़रूरत वाले धंधों के ख़िलाफ़ एक लड़ाई थी.
मीडिया लोगों की
परेशानी को अनदेखा करता रहा है. नोटबंदी नाम के इस त्यौहार में मीडिया ने
इन व्यापक दिक्कतों के सामने अपनी आँख बंद रखी.
दूसरा, अगर मीडिया उस वक्त तुरंत नोटबंदी के नुकसान को न देख पाया हो तो
भी वह कम से कम लंबे कुछ वक्त बीतने के बाद तो इसका सटीक विश्लेषण कर ही
सकता था. लेकिन विश्लेषण में की गई ये बेईमानी इसकी रिपोर्टिंग की
अवास्तविकता को दिखाती है.
अब विदेश नीति पर गौर करते हैं. नरेंद्र मोदी शिंजो आबे, व्लादीमिर
पुतिन या डोनल्ड ट्रंप के साथ खड़े होकर एक बेहद आकर्षक दृश्य पैदा करते
हैं और सभी को मोह लेते हैं. मीडिया भी इसमें भरपूर सहयोग देता है.
लेकिन, इस दौरान मीडिया इन चार देशों के नैतिक ख़ालीपन को देखना भूल जाता है.
नरेंद्र
मोदी यमन, सीरिया और रोहिंग्या मुसलमानों के मसले पर चुप्पी साधे रहते
हैं. एशिया को लेकर उनका विचार तय है. फिर भी मीडिया इसराइली नीति पर सवाल पूछे बिना इसराइल के मामले में मोदी के सहयोगी की भूमिका निभाता है. रक्षा
सौदों में इसराइल की भागीदारी का स्वागत करता है.
इस तरह अपनी रक्षा पर ज़ोर देने वाले भारत को मीडिया और मध्यम वर्ग की तारीफ़ मिलती है.
अगर गौर करें तो मोदी ने चीन के मामले में तिब्बत को धमकाने और शर्मिंदा
करने के अलावा ज़्यादा कुछ नहीं किया है. बस पाकिस्तान के मामले में थोड़ा
बहुत कुछ हासिल किया है.
लेकिन मीडिया विदेश नीति पर गंभीर नहीं दिखता है. इस मामले में मोदी का
वास्तविक आकलन बहुत कम होता है. मीडिया के पास बहुत कम संदेह और सवाल हैं.
हम पाकिस्तान और चीन पर ख्याली जीत की खुशी मनाते हैं. जहां मीडिया
वास्तविकता दिखाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता था वहां, वो जी-हुज़ूरी में लगा है और लोगों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से धोखा कर रहा
है.
'मॉब लिंचिंग' को लेकर मोदी के रवैए पर मीडिया का नज़रिया और
अधिक शर्मिंदा करता है. मीडिया मोदी की प्रतिक्रिया को साफ-सुथरा बनाने की
कोशिश करता है. मीडिया के पास कोई अलग नज़रिया न होना वाकई चिंता पैदा करता
है. वो शख़्स जिसने कांग्रेस से कई जवाब मांगे हों वो अब घटनाओं पर न के
बराबर ही प्रतिक्रियाएं दे रहा है. इस पर सवाल तो उठता ही है.
नरेंद्र
मोदी की उपलब्धियों और कमज़ोरियों को लेकर मीडिया के ढुलमुल रवैए के कारण
ये पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि विज्ञापन कहां ख़त्म होता है और मोदी
का संतुलित मूल्यांकन कहां से शुरू होता है.
यहां तक कि मीडिया असम को लेकर भी चुप है और बस कुछ छुट-पुट विश्लेषण
किए जा रहे हैं. यह नागरिक रजिस्टर को भारत की एक महान परंपरा की तरह दिखा
रहा है.
इन पूरे हालातों के बीच देश में विरोध और मतभेद के लिए जगह बहुत कम रह जाती है.
उम्मीद है कि मीडिया बहुसंख्यकवाद की उंगलियों पर नाचने की बजाए अपनी असली भूमिका में लौटेगा. मीडिया ने आपातकाल में एक अलग ही भूमिका निभाई थी. उम्मीद है कि मीडिया साल 2019
के चुनावों से पहले आलोचना और साहस की पत्रकारिता पर फिर से लौटेगा.
यह विरोध और लोकतंत्र का मीडिया पर एक कर्ज है.
र्नाटक निकाय चुनाव के नतीजे आज घोषित किए जा रहे हैं. 102 शहरी निकाय सीटों पर मतों की गिनती शुरू हो गई है. विधानसभा चुनाव के बाद एक बार कांग्रेस और जेडीएस एक दूसरे के खिलाफ लड़े हैं. यही वजह है कि निकाय चुनाव में कांग्रेस, बीजेपी और जेडीएस के बीच कांटे का मुकाबला है. बता दें कि 31 अगस्त को निकाय चुनाव के लिए वोट डाले गए थे.
अभी तक 2664 वार्डों में से कुल 1412 वार्ड के नतीजे
सामने आए हैं. इनमें से कांग्रेस ने 560, बीजेपी ने 499 और जेडी (एस) ने
178 सीटों पर जीत दर्ज की है.
राज्य के 105 शहरी निकाय क्षेत्र पर चुनाव हुए हैं.
इनमें 29 शहर नगरपालिकों, 53 नगर पालिकाओं. 23 नगर पंचायत और 135 कॉर्पोरशन
वार्ड पर नतीजे आ रहे हैं.
इन सभी सीटों के निकाय चुनाव के वार्ड के लिए 8,340
उम्मीदवार थे. वहीं कांग्रेस के 2,306, बीजेपी के 2,203 और 1,397 जेडीएस के
थे. इन चुनावों में का इस्तेमाल किया गया था.
दिलचस्प बात ये है कि इस चुनाव में कई उम्मीदवारों को
पार्टियों ने टिकट नहीं दी थी इसलिए वह निर्दलीय चुनाव लड़े थे. ऐसे में इन
निर्दलीय के नतीजे भी बहुत मायने रखेंगे.
बता दें कि 2013 के निकाय चुनाव में 4976 सीटों में से
कांग्रेस 1960 सीटें जीती थी. जबकि बीजेपी और कांग्रेस ने बीजेपी और जेडीएस
ने 905 सीटों पर जीत हासिल की थी. इसके अलावा 1206 सीटों पर निर्दलीय
उम्मीदवारों ने जीत दर्ज करने में सफल थे. हिंदू धर्म में कृष्ण जन्माष्टमी का खास महत्व है. पूरे देश में ये पर्व
बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है. आइए जन्माष्टमी के पवित्र अवसर पर जानते हैं
कि कृष्ण भगवान और राधा ने प्यार होने के बावजूद भी शादी क्यों नहीं की
थी?जब भी प्रेम की मिसाल दी जाती है तो श्रीकृष्ण-राधा के प्रेम का नाम सबसे
ऊपर लिया जाता है. राधा-श्रीकृष्ण के प्रेम को जीवात्मा और परमात्मा का
मिलन कहा जाता है. सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ियां राधा-कृष्ण की प्रेम कहानी
पढ़ती चली आ रही हैं लेकिन जब भी हम राधा-श्रीकृष्ण की प्रेम कहानी सुनते
हैं तो मन में यही सवाल आता है कि श्रीकृष्ण ने राधा से विवाह क्यों नहीं
किया? इसके पीछे कई तरह की व्याख्याएं दी जाती हैं. आइए जानते हैं उन सभी
कहानियों के बारे में...कुछ विद्वानों के मुताबिक, राधा-कृष्ण की कहानी मध्यकाल के अंतिम चरण में
भक्ति आंदोलन के बाद लोकप्रिय हुई. उस समय के कवियों ने इस आध्यात्मिक
संबंध को एक भौतिक रूप दिया. प्राचीन समय में रुक्मिनी, सत्यभामा, समेथा
श्रीकृष्णामसरा प्रचलित थी जिसमें राधा का कोई जिक्र नहीं मिलता है. 3228
ईसा पूर्व देवकी पुत्र श्रीकृष्ण का जन्म हुआ. कुछ समय तक वह गोकुल में रहे
और उसके बाद वृंदावन चले गए थे.श्रीकृष्ण राधा से 10 साल की उम्र में मिले थे. उसके बाद वह कभी वृंदावन
लौटे ही नहीं
श्रीकृष्ण और राधा एक दूसरे रूप से आत्मीय तौर पर जुड़े हुए थे इसीलिए
हमेशा उन्हें राधा-कृष्णा कहा जाता है, रुक्मिनी-कृष्णा नहीं. रुक्मिनी ने
भी श्रीकृष्ण को पाने के लिए बहुत जतन किए थे. वह अपने भाई रुकमी के खिलाफ
चली गई थीं. रुक्मिनी भी राधा की तरह श्रीकृष्ण से प्यार करती थीं,
रुक्मिनी ने श्रीकृष्ण को एक प्रेम पत्र भी भेजा था कि वह आकर उन्हें अपने
साथ ले जाएं.. इसके अलावा कहीं यह जिक्र भी नहीं मिलता है कि राधा ने कभी
द्वारका की यात्रा की हो. दक्षिण भारत के प्राचीन ग्रन्थों में राधा का कोई
उल्लेख नहीं मिलता है. राधा ने श्रीकृष्ण से विवाह करने से किया था इनकार-एक मत यह भी है
कि राधा ने श्रीकृष्ण से विवाह करने से मना कर दिया था क्योंकि उन्हें लगता
था कि वह महलों के जीवन के लिए उपयुक्त नहीं हैं. राधा एक ग्वाला थीं,
जबकि लोग श्रीकृष्ण को किसी राजकुमारी से विवाह करते हुए देखना चाहते थे.
श्रीकृष्ण ने राधा को समझाने की कोशिश की लेकिन राधा अपने निश्चय में दृढ़
थीं. राधा-श्रीकृष्ण के विवाह नहीं करने के पीछे एक व्याख्या ऐसी भी की
जाती रही है.एक अन्य प्रचलित व्याख्या के मुताबिक, रा
धा ने एक बार श्रीकृष्ण से पूछा कि
वह उनसे विवाह क्यों नहीं करना चाहते हैं? तो भगवान श्रीकृष्ण ने राधा को
बताया कि कोई अपनी ही आत्मा से विवाह कैसे कर सकता है? श्रीकृष्ण का आशय था
कि वह और राधा एक ही हैं. उनका अलग-अलग अस्तित्व नहीं है.राधा को यह एहसास हो गया था कि श्रीकृष्ण भगवान हैं और वह श्रीकृष्ण के
प्रति एक भक्त की तरह थीं. वह भक्तिभाव में खो चुकी थीं, जिसे कई बार लोग
भौतिक प्रेम समझ लेते हैं. इसलिए कुछ का मानना है कि राधा और श्रीकृष्ण के बीच विवाह का सवाल पैदा ही नहीं होता है, राधा और श्रीकृष्ण के बीच का
रिश्ता एक भक्त और भगवान का है. राधा का श्रीकृष्ण से अलग अस्तित्व नहीं
है. विवाह के लिए दो लोगों की आवश्यकता होती है.कुछ लोग इसकी इस तरह से भी व्याख्या करते हैं कि सामाजिक नियमों ने
राधा-कृष्णा की प्रेम कहानी में खलनायक की भूमिका निभाई.
राधा और श्रीकृष्ण
की समाजिक पृष्ठभूमि उनके विवाह की अनुमति नहीं देती थी.राधा को ठीक तरह से समझने के लिए रस और प्रेम के रहस्य को समझना होगा. ये
आध्यात्मिक प्रेम की आनंददायक अनुभूति है. एक व्याख्या के अनुसार, कृष्ण और
राधा ने बचपन में खेल-खेल में शादी की थी जैसे कि कई बच्चे शादी का खेल
खेलते हैं, लेकिन असलियत में दोनों का विवाह कभी नहीं हुआ. वैसे भी उनका प्यार वैवाहिक जीवन के प्यार से ज्यादा स्वाभाविक और आध्यात्मिक था.
कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी
कुमारस्वामी ने 100 में 50 का स्कोर बनाकर एक नया रिकॉर्ड बनाया है. ये
सुनने में क्रिकेट मैच के स्कोरकार्ड जैसा लग सकता है लेकिन है नहीं.
इसका
मतलब ये है कि उन्होंने जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन वाली अपनी सरकार के पहले
100 दिनों के भीतर 50 मस्जिदों, चर्चों और मंदिरों में दर्शन किए.
कुमारस्वामी के समर्थक और सहयोगी, जो ख़ुद भी काफ़ी धार्मिक हैं, वो भी इससे हैरान हैं.
मुख्यमंत्री 100 दिनों में 47 मंदिरों, एक दरगाह, एक मस्जिद और एक चर्च जा चुके हैं.
ऐसा नहीं है कि कुमारस्वामी हर दूसरे दिन मंदिर गए बल्कि ऐसा हुआ कि कई बार वो एक दिन में दो, तीन या चार मंदिर गए.
धार्मिक स्थलों पर जाने में उनकी सक्रियता कर्नाटक के सियासी हलकों में
चर्चा का विषय बनी हुई है. बहुत से लोग उनकी आलोचना भी कर रहे हैं.
इन दिनों बेंगलुरु में सबसे ज़्यादा सुना जाने वाला कमेंट है- हम भी धार्मिक हैं लेकिन रोज़ कूद-कूदकर मंदिर नहीं चले जाते.
तो अब सवाल ये है कि कुमारस्वामी जैसे नेता मंदिरों-मस्जिदों में इतना क्यों जाते हैं?
संस्कृत
के प्रोफ़ेसर एमए अलवर कहते हैं, "उन्हें अपनी सत्ता छिनने का डर होता है
और जब इंसान का भविष्य अनिश्चित होता है तो हम मनोवैज्ञानिक तौर पर कोई
दैवीय मदद ढूँढते हैं. वो किसी संन्यासी के पास जा सकते हैं, किसी दरगाह
में जा सकते हैं या किसी चर्च में जा सकते हैं."
केरल के ज्योतिष
विष्णु पूचक्कड़ के मुताबिक़, "जब लोग दुविधा में होते हैं तो किसी गुरु या
ज्योतिष के पास जाते हैं. पुराने ज़माने में राजा भी अपने गुरु या
ज्योतिषी से सलाह लेते थे. ठीक उसी तरह नेता मौजूदा वक़्त में पूजा-पाठ
करते हैं."
हालांकि, विष्णु ये भी मानते हैं कि आज भले ही लोग ज़्यादा पूजा-पाठ करने लगे हों, लेकिन सब कुछ बहुत व्यावसायिक हो गया है.
उन्होंने
कहा, "शास्त्रों की सही ढंग से व्याख्या होनी बहुत ज़रूरी है. ज्योतिषी
आपको सलाह दे सकता है लेकिन आपके अंदर आस्था होनी ज़रूरी है."
विष्णु
कहते हैं, "कुछ लोग सिर्फ़ डर की वजह से मंदिर-मस्जिद जाते हैं. कुछ लोग
सही रास्ता ढूंढने जाते हैं. फल दोनों को ही मिलता है. डरे हुए लोगों को
मानसिक शांति मिलती है और रास्ता ढूंढने वालों को रास्ता. लेकिन किसी भी
प्रार्थना के पूरे होने के लिए समर्पण होना चाहिए. जो पूजा कराता है उसके
मन में भी आस्था होनी बहुत ज़रूरी है."
लेकिन इतना ही काफ़ी नहीं होता. विष्णु के मुताबिक़, इंसान को अपनी बुद्धि से सही फ़ैसले भी लेने चाहिए.
डॉ.
श्रीधर मूर्ति कहते हैं, "नेताओं में असुरक्षा की भावना बहुत ज़्यादा होती
है. लेकिन धार्मिक क्रिया को किसी तरह परिभाषित नहीं किया जा सकता. मंदिर
जाने को धार्मिक कैसे कहा जा सकता है? भगवान तो सर्वव्यापी हैं, मेरे घर
में भी हैं. तो मुझे मंदिर, मस्जिद या चर्च क्यों जाऊं?"
विष्णु भी डॉ. मूर्ति से सहमति जताते हुए कहते हैं, "भगवान हमारे दिलों में हैं."
कुमारस्वामी के बारे में पूछने पर विष्णु कहते हैं, "मैं कह नहीं सकता
कि कुमारस्वामी के मन में क्या है. पहले राजा अपने राज्य के लिए पूजा-पाठ
करते थे. आज भी ये राज्य के लिए हो सकता है. भगवान की पूजा कई रूपों में हो
सकती है."
कुमारस्वामी का इस तरह मंदिर-मंदिर घूमना इसलिए भी आश्चर्यजनक है
क्योंकि वह अपने पिता और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा की तरह बिल्कुल
भी नहीं थे. एचडी देवगौड़ा की छवि एक धार्मिक और ज्योतिष में विश्वास रखने
वाले नेता की रही है.
कुमारस्वामी के कुछ क़रीबी सहयोगियों ने नाम
ज़ाहिर न होने की शर्त पर बताया था कि उन्होंने कसम खाई थी कि अगर उन्हें
मुख्यमंत्री बनने लायक सीटें नहीं मिलीं तो वो राजनीति छोड़ देंगे.
ख़ुशकिस्मती से कर्नाटक चुनाव के नतीजों में नाटकीय बदलाव देखने को मिला और कांग्रेस ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाने का प्रस्ताव दिया.
उनके
एक क़रीबी ने गोपनीयता की शर्त पर कहा, "मुझे लगता है कि इस घटना के बाद
उनमें काफ़ी बदलाव हुआ. उन्होंने सभी धार्मिक जगहों पर जाना शुरू कर दिया."
णे पुलिस ने मंगलवार को पाँच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार कर
लिया गया जबकि अदालत के आदेश की वजह से इनमें से एक को घर में नज़रबंद कर
दिया गया.
ये हैं वामपंथी विचारक और कवि वरवर राव, वकील सुधा भारद्वाज, मानवाधिकार कार्यकर्ता अरुण फ़रेरा, गौतम नवलखा और वरनॉन गोंज़ाल्विस.
पुलिस अधिकारी गिरफ़्तार लोगों को 'माओवादी हिंसा का दिमाग़' बता रहे हैं.
पुलिस का ये भी कहना है कि भीमा-कोरेगाँव में हुई हिंसा के लिए भी इन लोगों की भूमिका की जाँच की जा रही है.
ये कार्रवाई आतंक निरोधी कानून और भारतीय दंड संहिता की धारा 153ए, 505 (1)(बी), 117, 120 (बी) और 34 के तहत की गई.
इस मामले में इतिहासकार रोमिला थापर और
चार अन्य लोगों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है. याचिका में
गिरफ़्तार मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की रिहाई की मांग की गई है.
याचिका में मामले की स्वतंत्र जाँच कराने की मांग की गई है और कहा गया है कि गिरफ़्तारियाँ विरोध की आवाज़ को दबाने की कोशिश है.
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले
में मीडिया रिपोर्ट्स पर स्वत: संज्ञान लेते हुए कहा है कि आयोग को ऐसा
लगता है कि इस मामले में प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है. इस कारण ये
मानवाधिकार उल्लंघन का मामला हो सकता है.
एनएचआरसी ने महाराष्ट्र के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को नोटिस जारी करके चार सप्ताह के अंदर रिपोर्ट देने को कहा है.पिछले साल 31 दिसंबर को यलगार परिषद का आयोजन किया गया था. इस परिषद में
माओवादियों की कथित भूमिका की जांच में लगी पुलिस ने कई राज्यों में सात
कार्यकर्ताओं के घरों पर छापेमारी की और पांच कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार कर
लिया गया.
इस परिषद का आयोजन पुणे में 31 दिसंबर 2017 को किया गया
था और अगले दिन 1 जनवरी को भीमा कोरेगांव में दलितों को निशाना बनाकर बड़े
पैमाने पर हिंसा हुई थी. महाराष्ट्र में पुणे के क़रीब भीमा कोरेगांव गांव
में दलित और अगड़ी जाति के मराठाओं के बीच टकराव हुआ था.
भीमा
कोरेगांव में दलितों पर हुए कथित हमले के बाद महाराष्ट्र के कई इलाकों में
विरोध-प्रदर्शन किए गए. दलित समुदाय भीमा कोरेगांव में हर साल बड़ी संख्या
में जुटकर उन दलितों को श्रद्धांजलि देते हैं जिन्होंने 1817 में पेशवा की
सेना के ख़िलाफ़ लड़ते हुए अपने प्राण गंवाए थे.ऐसा माना जाता है कि ब्रिटिश सेना में शामिल दलितों (महार) ने मराठों को
नहीं बल्कि ब्राह्मणों (पेशवा) को हराया था. बाबा साहेब आंबेडकर खुद 1927
में इन सैनिकों को श्रद्धांजलि देने वहां गए थे.
मंगलवार सबेरे छापेमारी के बाद जो लोग गिरफ़्तार किए गए, उनमें हैदराबाद
से वरवर राव, मुंबई में वरनॉन गोंज़ाल्विस और अरुण फ़रेरा, फ़रीदाबाद में
सुधा भारद्वाज और नई दिल्ली में गौतम नवलखा शामिल हैं. रांची में स्टैन
स्वामी और गोवा में आनंद तेलतम्बदे के घर पर भी छापा मारा गया.
सुधा भारद्वाज एक वकील और ऐक्टिविस्ट हैं. वो दिल्ली के नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में गेस्ट फ़ैकल्टी के तौर पर पढ़ाती हैं. सुधा ट्रेड यूनियन
में भी शामिल हैं और मज़दूरों के मुद्दों पर काम करती हैं. उन्होंने
आदिवासी अधिकार और भूमि अधिग्रहण पर एक सेमिनार में हिस्सा लिया था. वो
दिल्ली न्यायिक अकादमी का भी एक हिस्सा हैं. वरवर राव
वरवर
पेंड्याला राव वामपंथ की तरफ़ झुकाव रखने वाले कवि और लेखक हैं. वो
'रेवोल्यूशनरी राइटर्स असोसिएशन' के संस्थापक भी हैं. वरवर वारंगल ज़िले के
चिन्ना पेंड्याला गांव से ताल्लुक रखते हैं. उन्हें आपातकाल के दौरान भी
साज़िश के कई आरोपों में गिरफ़्तार किया गया था, बाद में उन्हें आरोपमुक्त
करके रिहा कर दिया था.
वरवर की रामनगर और सिकंदराबाद षड्यंत्र जैसे
20 से ज़्यादा मामलों में जांच की गई थी. उन्होंनें राज्य में माओवादी
हिंसा ख़त्म करने के लिए चंद्रबाबू सरकार और माओवादी नेता गुम्माडी विट्ठल
राव ने मिलकर मध्यस्थता की थी. जब वाईएस राजशेखर रेड्डी सरकार ने
माओवादियों ने बातचीत की, तब भी उन्होंने मध्यस्थ की भूमिका भी निभाई.
गौतम नवलखा एक मशहूर ऐक्टिविस्ट हैं, जिन्होंने नागरिक अधिकार,
मानवाधिकार और लोकतांत्रिक अधिकार के मुद्दों पर काम किया है. वे अंग्रेज़ी
पत्रिका इकोनॉमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली (ईपीडब्ल्यू) में सलाहकार संपादक के
तौर पर भी काम करते हैं.
नवलखा लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए काम करने
वाली संस्था पीपल्स यूनियन फ़ॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पीयूडीआर) से जुड़े
हैं. नवलखा ने पीयूडीआर के सचिव के तौर पर भी काम किया है और इंटरनेशनल
पीपल्स ट्राइब्यूनल ऑन ह्यूमन राइट्स ऐंड जस्टिस इन कश्मीर के संयोजक के
तौर पर भी काम किया है. अरुण फ़रेरा
मुंबई
के बांद्रा में जन्मे अरुण फ़रेरा मुंबई सेशंस कोर्ट और मुंबई हाई कोर्ट
में प्रैक्टिस करते हैं. वो अनलॉफ़ुल एक्टिविटीज़ प्रिवेंशन एक्ट और
देशद्रोह के अभियोग में चार साल जेल में रह चुके हैं.
अरुण फ़रेरा इंडियन एसोसिएशन ऑफ़ पीपल्स लॉयर्स के कोषाध्यक्ष भी हैं.
फ़रेरा
भीमा-कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में गिरफ़्तार हुए दलित कार्यकर्ता सुधीर
धावले के पक्ष में भी अपनी आवाज़ उठाते रहे हैं. मुंबई के गोरेगांव और
जोगेश्वरी में 1993 में हुए दंगों के पीड़ितों के बीच काम करने के बाद,
अरुण फ़रेरा का रुझान मार्क्सवाद की ओर बढ़ा था. इन दंगों के बाद उन्होंने
देशभक्ति युवा मंच नाम की संस्था के साथ काम करना शुरू कर दिया. इस संस्था
को सरकार माओवादियों का फ़्रंट बताती थी. वरनॉन गोंज़ाल्विस
मुंबई
में रहने वाले वरनॉन गोंज़ाल्विस लेखक-कार्यकर्ता हैं. वो मुंबई
विश्वविद्यालय से गोल्ड मेडलिस्ट हैं और मुंबई के कई कॉलेजों में कॉमर्स
पढ़ाते रहे हैं. उन्हें 2007 में अनलॉफ़ुल एक्टिविटीज़ प्रिवेंशन एक्ट के
तहत गिरफ़्तार किया गया था. वो छह साल तक जेल में रहे थे.
गोंज़ाल्विस
को नागपुर के ज़िला और सत्र न्यायालय ने यूएपीए की अलग-अलग धाराओं के तहत
दोषी पाया था. वरनॉन की पत्नी सुज़न अब्राहम भी मानवाधिकार मामलों की एक
वकील हैं. वरनन गोंज़ाल्विस के बेटे सागर अब्राहम गोंज़ांलविस ने बताया कि सब लैपटाप वगैरह के साथ बहुत सारे साहित्य साथ ले गये.