क्रिकेट वर्ल्ड कप 2019 में बांग्लादेश को 28 रनों से हरा कर भारतीय टीम सेमीफ़ाइनल में पहुंचने वाली दूसरी टीम बनी. वहीं बांग्लादेश
टूर्नामेंट से बाहर होने वाला तीसरा एशियाई देश.
इससे पहले अफ़गानिस्तान और श्रीलंका टूर्नामेंट से बाहर हो चुके हैं.
बुधवार को इस टूर्नामेंट के सेमीफ़ाइनल में पहुंचने वाली तीसरी टीम भी तय हो जायेगी. यह मुक़ाबला न्यूज़ीलैंड और इंग्लैंड के बीच होना है.
जो जीतेगा, अंतिम चार में उसकी जगह पक्की हो जायेगी.
लेकिन सेमीफ़ाइनल की चौथी टीम कौन बनेगी इसका फ़ैसला गुरुवार को पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच होने वाले मुक़ाबले से ही तय होगा.
बांग्लादेश तो बाहर हो चुका है लेकिन पाकिस्तान के पास अभी यह मौका बाकी है. लेकिन नॉकआउट चरण में उसका पहुंचना बहुत हद तक बुधवार यानी 3 जुलाई के
न्यूज़ीलैंड-इंग्लैंड मुक़ाबले पर निर्भर करता है.
यह मैच न्यूज़ीलैंड और इंग्लैंड के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है क्योंकि जो भी
टीम इसमें हार गयी उसके भाग्य का फ़ैसला पाकिस्तान के मुक़ाबले पर टिका
होगा.
इस मैच से पहले अंक तालिका में न्यूज़ीलैंड 11 और इंग्लैंड 10 अंकों के साथ तीसरे और चौथी स्थान पर काबिज हैं. यानी मुक़ाबला जीतने वाली टीम सेमीफ़ाइनल की तीसरी टीम बन जायेगी ये तो तय है.
लेकिन पाकिस्तान
चाहेगा कि यह मुक़ाबला न्यूज़ीलैंड ही जीते क्योंकि कीवियों की जीत से इंग्लैंड के खाते में 10 अंक ही रह जायेंगे और बांग्लादेश से जीत कर
सेमीफ़ाइनल की चौथी टीम बनना उनके लिए आसान होगा. बांग्लादेश से जीतने की स्थिति में पाकिस्तान के 11 अंक हो जायेंगे.
वहीं अगर यह मुक़ाबला इंग्लैंड जीत जाता है तो न्यूज़ीलैंड के 11 अंक ही
रह जायेंगे और यह स्थिति पाकिस्तान के लिए बहुत महंगी साबित होगी क्योंकि
तब बांग्लादेश से उसे बड़े अंतर से जीतना होगा ताकि उसे नेट रन रेट के आधार पर सेमीफ़ाइनल में जगह मिल सके.
अभी पाकिस्तान का नेट रन रेट
-0.792 है जबकि न्यूज़ीलैंड का 0.572 है यानी अंतर 1 से अधिक का है. और इस
अंतर को पाटना पाकिस्तान के लिए बड़ी ही टेढ़ी खीर साबित होगा.
वैसे नेट रन रेट के हिसाब से इंग्लैंड (नेट रन रेट 1 है) सबसे अधिक फायदे की स्थिति में है.
किसी टीम का नेट रन रेट पता करना हो तो इसके लिए बहुत ही आसान गणित है.
टीम
ने टूर्नामेंट में जितने रन बनाये हैं. उसे उन ओवर्स से भाग दे दें जो उसने खेले हैं. दूसरे शब्दों में इसे पूरे टूर्नामेंट में किसी टीम का प्रति ओवर बल्लेबाज़ी औसत कह सकते हैं.
अब उस टीम के ख़िलाफ़ प्रति ओवर कितने रन बने हैं ये निकाल लें यानी गेंदबाज़ी औसत.
बल्लेबाज़ी से गेंदबाज़ी औसत को घटाने से निकल जायेगा नेट रन रेट.
लीग
मैचों में भले ही पाकिस्तान ने न्यूज़ीलैंड और इंग्लैंड दोनों को मात दे रखी है लेकिन जब सेमीफ़ाइनल में पहुंचने का मुक़ाबला नेट रन रेट के आधार पर
तय होगा तब वह इन दोनों टीमों से बहुत पीछे है और बहुत संभव है कि ऐसी स्थिति में यह पिछड़ जायेगी.
इस टूर्नामेंट में अब तक चार मैच बारिश की वजह से धुल चुके हैं. श्रीलंका के ख़िलाफ़ पाकिस्तान का शुरुआती लीग मैच भी इसकी भेंट चढ़ चुका है. तो अगर बांग्लादेश के साथ मुक़ाबले में भी बारिश विलेन बनी तो
पाकिस्तान का वर्ल्ड कप से बाहर होना तय हो जायेगा. क्योंकि तब नेट रन रेट
के आधार पर वह बिना खेले ही बाहर हो जायेंगे.
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Wednesday, July 3, 2019
Tuesday, June 25, 2019
अमित शाह के कश्मीर दौरे से उपजी उम्मीदें
भारत सरकार के दूसरे सबसे ताक़तवर शख़्स और गृह मंत्री अमित शाह बुधवार को भारत प्रशासित कश्मीर के दौरे पर आ रहे हैं.
उनका यह दौरा मिली-जुली भावनाओं वाले समय में हो रहा है जहां एक तरफ़
एनकाउंटरों में आम लोगों की मौत पर नाराज़गी है तो दूसरी तरफ़ केंद्र की ओर से सूबे में शांति स्थापित करने की इच्छा जताई गई है.बतौर गृह मंत्री यह अमित शाह का पहला कश्मीर दौरा होगा. वह राज्यपाल सत्यपाल मलिक और सेना के शीर्ष कमांडरों से मुलाक़ात करके हालात की जानकारी लेंगे.
माना जा रहा है कि वह कश्मीर के दक्षिणी हिस्से में स्थित हिंदुओं के पवित्र तीर्थ अमरनाथ भी जा सकते हैं.
लेकिन अमित शाह के इस दौरे में सबसे ख़ास बात वो उम्मीद है जो हाल ही में राज्यपाल सत्यपाल मलिक के बयान से उपजी थी. मलिक ने कहा था कि अलगाववादी समूह हुर्रियत कांफ्रेंस कश्मीर में शांति स्थापित करने के लिए बातचीत को तैयार है.
हुर्रियत नेतृत्व की ओर से भी बातचीत को लेकर सकारात्मक संकेत मिले हैं और कहा गया है कि शांति स्थापित करने और कश्मीर मसले के हल के लिए किसी भी 'इंडो-पाक क़दम' का समर्थन किया जाएगा.
पूर्व प्रधानमंत्रियों अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह से हुई बातचीत में हुर्रियत प्रतिनिधिमंडल में शामिल रहे समूह के पूर्व चेयरमैन अब्दुल ग़नी बट ने कहा, "जंग कभी भी विकल्प नहीं है. दोनों देशों को युद्ध और ध्वंस से आगे सोचना होगा. हमें बात करने की ज़रूरत है और हम तैयार हैं."
सूबे में भारत के पक्षधर नेता केंद्र की कश्मीर नीति में बदलाव के आसार देखते हुए उत्साहित हैं. पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह और महबूबा मुफ़्ती ने लगभग एक जैसे बयानों में कश्मीर के अलगाववादियों और पाकिस्तान से सार्थक संवाद की वकालत की है.
पूर्व विधायक और कश्मीर के मुखर नेता इंजीनियर रशीद का कहना है, "मीडिया का एक हिस्सा कह रहा है कि हुर्रियत ने अपनी हार स्वीकार कर ली है. हुर्रियत की एक भूमिका है और अमित शाह को भी उदारता दिखानी चाहिए."
रशीद 'हिंसा के दुष्चक्र को ख़त्म करने और हल की प्रक्रिया शुरू करने के लिए' चरमपंथी नेतृत्व से भी बातचीत की वकालत करते हैं.
मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल में सूबे में हिंसक विरोध प्रदर्शन, एनकाउंटर, हत्याएं, पाबंदियां, गिरफ्तारी और राजनीतिक समूहों पर प्रतिबंध की घटनाएं देखने को मिली थीं. लेकिन अब यहां कई लोग मानने लगे हैं कि नई मोदी सरकार 'कश्मीर मसले के सैन्य नहीं, बल्कि राजनीतिक हल को लेकर अधिक आत्मविश्वासी नज़र आती है.'
हालांकि अतीत में दिल्ली और श्रीनगर के बीच वार्ता की कई कोशिशें परवान नहीं चढ़ पाई हैं इसलिए नौजवान कश्मीरी आशंकाओं से भरे हुए हैं. श्रीनगर में रहने वाली रिसर्च स्कॉलर इंशा आफ़रीन कहती हैं, "पुलिस नौजवानों के पीछे पड़ी है, ज़्यादातर हुर्रियत नेता जेल में हैं और लोग मारे जा रहे हैं. बातचीत का एजेंडा क्या होगा और बात कौन करेगा?"
हालांकि नौजवान लेखक एजाज़ को अमित शाह के दौरे से उम्मीदें हैं. वह कहते हैं, "अगर राज्यपाल का प्रशासन स्थिति के नियंत्रण में होने और सब कुछ पटरी पर लौटने का दावा कर रहा है तो हमें उम्मीद है कि अमित शाह अच्छी ख़बर के साथ यहां आ रहे हैं."
अतीत में दिल्ली-श्रीनगर के बीच बातचीत की छह से ज़्यादा कोशिशों में आम सहमति नहीं बन सकी है क्योंकि दोनों पक्ष अपनी शर्तों से डिगने को तैयार नहीं हुए.
श्रीनगर में रहने वाले पत्रकार और विश्लेषक रियाज़ मलिक कहते हैं, "दिल्ली अपनी शर्तें थोपना चाहती है. हुर्रियत भी पीछे हटने को तैयार नहीं. अगर अमित शाह के पास कोई बीच का रास्ता है और वो किसी फॉर्मूले के साथ आ रहे हैं तो हम गतिरोध टूटने की उम्मीद कर सकते हैं."
भारतीय गृह मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक़, भारत प्रशासित कश्मीर में बीते तीन साल में सात सौ चरमपंथी मारे गए हैं. इसके अलावा एनकाउंटर की जगहों पर सुरक्षा बलों के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन करने वाले 150 से ज़्यादा आम लोगों की मौत हुई है. अमित शाह जब कश्मीर में बोलेंगे तो इतने वर्षों से मौत, तबाही और पाबंदियों के बीच रहते हुए ज़्यादातर कश्मीरी उनसे हृदय-परिवर्तन की उम्मीद लगाए बैठे होंगे.
Tuesday, June 18, 2019
工行能否履行气候承诺将在南非见分晓
明天,标准银行的股东们将就是否披露和报告气候风险进行投票。用一位专家的话说,此举迈出了“开创性的一步”。
这项决议是由标准银行的股东提出的。中国工商银行拥有标准银行20.1%的股份,所以它的决定将直接影响投票结果。
中国工商银行是全球最大的银行,并参与了气候相关财务信息披露工作组(TCFD)和其他多个类似倡议活动。所以,本次投票也被认为是对中国工商银行气候诚信的一次检验。观察家们不禁想问:“中国工商银行会做出正确的选择吗?”
业内首次就气候风险公开投票
这项股东决议的提出还要归功于南非非盈利组织RAITH Foundation和股东活动家西奥·博塔,并得到了投资者行动组织JustShare的支持。这也是约翰内斯堡证券交易所上市公司中首个由股东提出的有关气候风险的决议。
去年,这些股东和组织联盟还向南非最大的碳排放机构—能源化工企业萨索尔(SASOL)提交了类似的决议申请。但是萨索尔公司拒绝了这个提案,股东投票自然也就没有举行。
JustShare执行董事特雷西·戴维斯表示,标准银行能够接受股东提案,这对南非地区的负责任投资来说是“突破性的一步”。
戴维斯指出:“这是他们(南非投资者)第一次需要向客户明确表明自己对气候风险的认真态度。”
这个决议包括两部分。首先,要求银行评估和报告其投资行为导致的温室气体排放,以及银行因此面临的气候风险。其次,要求银行必须全面披露其煤电融资政策(目前公开的只有一份媒体公告),并将该政策拓展到煤炭开采领域。
披露气候风险依据的理念是,对污染性行业的投资最终都将成为风险资产。披露此类风险符合投资者的利益,因为他们需要这类信息来做出合理的投资决策。同时,这也符合全球经济从碳密集型资产转型的需要。
近些年来,这一理念在股东中间越来越有市场,建立气候相关财务信息披露工作组(TCFD)更是体现了这一点。TCFD成立于2015年,宗旨是“制定企业向投资者、债权人、保险公司及其他利益相关方提供相关信息时使用的、自愿、一致的气候相关风险披露原则”。如今,TCFD已经拥有了580个组织成员。
工行与气候承诺
决议通过至少需要50%的股东投赞成票。但是,提出这项决议的团体只拥有不到0.001%的投票权。而全面支持这项决议的资管经理公司Mergence Investment Managers只有不到0.4%的投票权。
中国工商银行拥有标准银行五分之一的股份,是该行目前最大的股东。中国工商银行已经在2017年6月加入了TCFD,也是中国唯一一家参与这一组织的银行。而目前,还没有一家南非银行参与这个组织。
JustShare和Mergence指出,这项决议被提上标准银行股东大会的议程与TCFD的建议是一致的,而Mergence更是称TCFD的建议是气候风险披露领域的“全球最佳实践”。
包括中国工商银行在内的TCFD成员在2017年6月声明:“通过签署这份协议,我们很自豪地表达了自己对更好地披露气候相关风险和机遇的坚定支持。同时,我们也敦促其他商业领袖也加入我们的行列。”
通过中英TCFD试点小组,中国工商银行还签署了自己的气候风险披露时间表,并计划于今年年底开始实施。
绿色和平组织东亚地区可持续金融项目负责人劳伦·胡莱特认为,秉承自己有关气候风险披露的承诺,中国工商银行应当投票赞成这项决议。但是她也强调,工行的言行其实并不一致。比如在2018年的气候风险披露项目的排名中,中国工商银行的评分只有F。
胡莱特说:“中国工商银行多次公开表示支持气候风险披露。如今,面对这样一个信息披露的约束性要求,工行也的确该表明自己真实的态度了。”
可能的结果
标准银行董事会已经建议股东投票否决这一决议,因为董事会认为,南非政府目前的环境、社会和监管措施以及碳报告制度已经能够解决股东关切的问题。
中国工商银行还没有公开表示自己的投票意向。但是,JustShare的戴维斯认为,在标准银行董事会拥有两个席位的工行不大可能会赞成这项决议,而且建议其他股东反对这一决议的决定很有可能就是受到了工行的影响。
绿色和平的胡莱特表示,投票仍然是一个“试金石”。
“通过这次投票,中国工商银行有机会表明,他们深刻地认识到了气候风险披露对环保的重要性。”
这项决议是由标准银行的股东提出的。中国工商银行拥有标准银行20.1%的股份,所以它的决定将直接影响投票结果。
中国工商银行是全球最大的银行,并参与了气候相关财务信息披露工作组(TCFD)和其他多个类似倡议活动。所以,本次投票也被认为是对中国工商银行气候诚信的一次检验。观察家们不禁想问:“中国工商银行会做出正确的选择吗?”
业内首次就气候风险公开投票
这项股东决议的提出还要归功于南非非盈利组织RAITH Foundation和股东活动家西奥·博塔,并得到了投资者行动组织JustShare的支持。这也是约翰内斯堡证券交易所上市公司中首个由股东提出的有关气候风险的决议。
去年,这些股东和组织联盟还向南非最大的碳排放机构—能源化工企业萨索尔(SASOL)提交了类似的决议申请。但是萨索尔公司拒绝了这个提案,股东投票自然也就没有举行。
JustShare执行董事特雷西·戴维斯表示,标准银行能够接受股东提案,这对南非地区的负责任投资来说是“突破性的一步”。
戴维斯指出:“这是他们(南非投资者)第一次需要向客户明确表明自己对气候风险的认真态度。”
这个决议包括两部分。首先,要求银行评估和报告其投资行为导致的温室气体排放,以及银行因此面临的气候风险。其次,要求银行必须全面披露其煤电融资政策(目前公开的只有一份媒体公告),并将该政策拓展到煤炭开采领域。
披露气候风险依据的理念是,对污染性行业的投资最终都将成为风险资产。披露此类风险符合投资者的利益,因为他们需要这类信息来做出合理的投资决策。同时,这也符合全球经济从碳密集型资产转型的需要。
近些年来,这一理念在股东中间越来越有市场,建立气候相关财务信息披露工作组(TCFD)更是体现了这一点。TCFD成立于2015年,宗旨是“制定企业向投资者、债权人、保险公司及其他利益相关方提供相关信息时使用的、自愿、一致的气候相关风险披露原则”。如今,TCFD已经拥有了580个组织成员。
工行与气候承诺
决议通过至少需要50%的股东投赞成票。但是,提出这项决议的团体只拥有不到0.001%的投票权。而全面支持这项决议的资管经理公司Mergence Investment Managers只有不到0.4%的投票权。
中国工商银行拥有标准银行五分之一的股份,是该行目前最大的股东。中国工商银行已经在2017年6月加入了TCFD,也是中国唯一一家参与这一组织的银行。而目前,还没有一家南非银行参与这个组织。
JustShare和Mergence指出,这项决议被提上标准银行股东大会的议程与TCFD的建议是一致的,而Mergence更是称TCFD的建议是气候风险披露领域的“全球最佳实践”。
包括中国工商银行在内的TCFD成员在2017年6月声明:“通过签署这份协议,我们很自豪地表达了自己对更好地披露气候相关风险和机遇的坚定支持。同时,我们也敦促其他商业领袖也加入我们的行列。”
通过中英TCFD试点小组,中国工商银行还签署了自己的气候风险披露时间表,并计划于今年年底开始实施。
绿色和平组织东亚地区可持续金融项目负责人劳伦·胡莱特认为,秉承自己有关气候风险披露的承诺,中国工商银行应当投票赞成这项决议。但是她也强调,工行的言行其实并不一致。比如在2018年的气候风险披露项目的排名中,中国工商银行的评分只有F。
胡莱特说:“中国工商银行多次公开表示支持气候风险披露。如今,面对这样一个信息披露的约束性要求,工行也的确该表明自己真实的态度了。”
可能的结果
标准银行董事会已经建议股东投票否决这一决议,因为董事会认为,南非政府目前的环境、社会和监管措施以及碳报告制度已经能够解决股东关切的问题。
中国工商银行还没有公开表示自己的投票意向。但是,JustShare的戴维斯认为,在标准银行董事会拥有两个席位的工行不大可能会赞成这项决议,而且建议其他股东反对这一决议的决定很有可能就是受到了工行的影响。
绿色和平的胡莱特表示,投票仍然是一个“试金石”。
“通过这次投票,中国工商银行有机会表明,他们深刻地认识到了气候风险披露对环保的重要性。”
Sunday, May 26, 2019
मोदी राज में विपक्ष के अस्तित्व का संकट, सरकार पर कौन लगाएगा अंकुश?
लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की अगुआई वाले एनडीए गठबंधन को बड़ी जीत हासिल हुई है. भाजपा ने अकेले तीन सौ के आंकड़ों को पार किया और 303 सीटों पर जीत का परचम लहराने
में सफल रही.
अन्य सहयोगी पार्टियों के साथ ने इस जीत को और प्रचंड बना दिया. एनडीए ने लोकसभा की कुल 353 सीटों पर कब्जा किया, वहीं कांग्रेस
की अगुआई वाला यूपीए 92 सीटों पर सिमट कर रह गया.कांग्रेस के अकेले प्रदर्शन की बात करें तो काफी खींच-तान के बाद पार्टी को महज 52 सीटों पर सफलता मिली.
भाजपा की इस बड़ी जीत के बाद भारतीय राजनीति में विपक्ष के सामने एक बार फिर अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है.
सत्रहवीं लोकसभा में सरकार के सामने आधिकारिक रूप से विपक्ष का नेता नहीं होगा. पिछली सरकार में भी ऐसी ही स्थिति थी.
सदन में सरकार के सामने कई विपक्षी पार्टियां होती हैं, लेकिन आधिकारिक तौर पर उस पार्टी को विपक्ष का नेता बनाने का मौका मिलता है जिसके पास कम से कम 10 फीसदी सीटें हासिल हों.
यानी 543 सीटों वाले लोकसभा में विपक्ष का नेता उस पार्टी का होगा, जिसके पास कम से कम 55 सीट होंगी.
इस बार कांग्रेस इस आंकड़े को छू पाने में सफल नहीं रही है. पार्टी के पास 52 सांसद हैं और विपक्षी नेता का तमग़ा हासिल करने से वो तीन पायदान नीचे रह गई.
2014 के चुनावों की बात करें तो कांग्रेस महज 44 सीटों पर जीत हासिल कर पाई थी और उस बार भी सदन को विपक्ष का नेता नहीं मिल पाया था.
मोदी राज में न सिर्फ विपक्षी पार्टियों बल्कि विपक्ष के नेता के अस्तित्व पर संकट गहरा गया है. अब सवाल उठता है कि ऐसे में भारतीय लोकतंत्र किस ओर जाएगा?
इस सवाल के जवाब में वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी कहते हैं कि हमारी संसदीय राजनीति में विपक्ष के नेता की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका संविधान के अनुसार लोकतंत्र को चलाने के लिए होती है.
नवीन जोशी कहते हैं, "संवैधानिक संस्थानों जैसे सीबीआई का निदेशक या सूचना आयुक्त की नियुक्ति या फिर सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति में प्रतिपक्ष के नेता की बड़ी भूमिका होती है."
"विपक्ष के नेता का ओहदा प्रधानमंत्री और चीफ जस्टिस के स्तर का समझा जाता है. पिछली बार भी कांग्रेस इतनी सीटें नहीं ला पाई थी कि तकनीक तौर पर विपक्ष के नेता का दर्जा हासिल कर पाती, इस बार भी वो यह दर्जा पाने में नाकाम रही है."
"ऐसे में फर्क तो पड़ता है. जो आवाज़ एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की हो सकती है, वो कृपा या सरकार की उदारता के कारण मिले दर्जे की नहीं हो सकती है."
एक स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिए एक मज़बूत सरकार के सामने एक मजबूत विपक्ष का होना ज़रूरी समझा जाता है. विपक्ष सरकार के कार्यों और नीतियों पर सवाल उठाता है और उसे निरंकुश होने से रोकता है.
संसद में अगर विपक्ष कमज़ोर होता है तो मनमाने तरीके से सत्ता पक्ष कानून बना सकता है और सदन में किसी मुद्दे पर अच्छी बहस मज़बूत विपक्ष के बिना संभव नहीं है.
भारतीय लोकतंत्र इस बात का गवाह रहा है कि जब भी कर्पूरी ठाकुर, अटल बिहारी वाजपेयी, भैरो सिंह शेखावत, लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता संसद में बोलते थे, सत्ता पक्ष उनकी बातों को संजीदगी से सुनता था.
न सिर्फ सुनना, नीतियों और योजनाओं को विपक्ष की बहस से धार दिया जाता था और उसे जनोत्थान के लिए बेहतर समझा जाता है.
एनडीए सरकार भी मज़बूत विपक्ष के महत्व को समझती है. भाजपा के वरिष्ठ नेता तरुण विजय क्षेत्रीय अख़बार प्रभात ख़बर
पहले के मुकाबले अब नेता प्रतिपक्ष की ज़रूरत संसद को कितनी है, इस सवाल के जवाब में वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी कहते हैं कि पहली, दूसरी और तीसरी लोकसभा का जो दौर था वो नेहरू का दौर था, उस वक़्त लोकतंत्र की नींव रखी जा रही थी, संविधान निर्माताओं ने जो स्वरूप बनाया था, उसका सख़्ती से पालन किया जा रहा था.
नवीन जोशी बताते हैं कि विपक्ष के नेता के प्रति नेहरू के मन में बड़ा आदर था और वो आलोचनाओं को आमंत्रित करते थे. कई बार संसदीय भाषण में उन्होंने खुद कहा था कि मेरी आलोचना मेरे सामने करने में कोई संकोच नहीं किया जाए.
वे कहते हैं, "उस दौर में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका उतनी खली नहीं होगी. लेकिन आज के दौर में थोड़ी आशंकाएं होती हैं. पिछली भाजपा सरकार के दौरान कई ऐसे मौके आए जब संवैधानिक संस्थानों से छेड़छाड़ करने के आरोप लगे."
में प्रकाशित एक लेख में लिखते हैं, "विपक्ष धारदार, असरदार और ईमानदार हो तो सरकार उसके डर से कांपती है, देश का भला होता है, सरकारी नेताओं का अंहकार, उनकी निरंकुश और मनमानी नियंत्रित रहती है."
सोलहवीं और सत्रहवीं लोकसभा के दौरान विपक्ष के नेता का न होने का यह पहला या दूसरा मामला नहीं है. इससे पहले, पहली, दूसरी और तीसरी लोकसभा के दौरान भी ऐसी ही स्थिति बनी थी.
इस दौरान कांग्रेस को सदन में 360 से 370 सीटें मिली थीं. उसके मुकाबले पहली तीन लोकसभा में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सदन की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी. सीपीआई को इस दौरान 16 से 30 सीटें ही मिली थीं.
1952 में देश में पहली बार हुए आम चुनावों के 17 साल बाद सदन को विपक्ष का नेता मिला. चौथे लोकसभा के दौरान साल 1969 में राम सुभाग सिंह पहले विपक्ष के नेता बने.
उस लोकसभा के दौरान कांग्रेस पार्टी में बंटवारे के बाद यह स्थिति उत्पन्न हुई थी और कांग्रेस के राम सुभाग सिंह को लोकसभा अध्यक्ष ने विपक्ष के नेता की मान्यता दी.
वो 1970 तक इस पद पर बने रहे. इसके बाद कांग्रेस की जोड़-तोड़ में कई बार कांग्रेस के नेता विपक्ष के नेता के तौर पर चुने गए. 1979 में जनता पार्टी के जगजीवन राम पहले ऐसे गैर कांग्रेस नेता थे जिन्हें विपक्ष के नेता का दर्जा मिला.
पांचवे और सातवें लोकसभा के दौरान भी मुख्य विपक्षी दल के पास संख्या बल इतना नहीं था कि उनके नेता को विपक्ष के नेता का दर्जा दिया जा सके.
Friday, May 3, 2019
تدوينة "ساخرة" أودت بحياة أمي
في كل مرة ولشهور عدة، كنتُ أقابل الشخص الذي يُشرف على التحقيق في عملية اغتيال والدتي. وكانت أسرتي قد
قابلته للمرة الأولى منذ ست سنوات عندما جاء إلى منزلنا لإلقاء القبض
عليها.
كانت والدتي قد نشرت مدونة تسخر فيها من مرشح لرئاسة الوزارة في يوم الانتخابات، فقدم أحد مؤيديه شكوى ضدها لدى الشرطة.وهكذا أُرسل المحقق إلى منزلنا منتصف الليل وهو يحمل مذكرة إلقاء قبض بحقها، بتهمة سماها "التعبير غير القانوني عن الرأي".
كنتُ وقتها أعمل في الطرف الآخر من العالم، وكان معارف يرسلون لي أشرطة تظهرها وقد أُطلق سراحها من مركز للشرطة في الواحدة والنصف بعد منتصف الليل وهي ترتدي قميص والدي.
ولكن، وبعد ساعات قلائل، كانت والدتي تعاود الكتابة عبر الانترنت واصفة ما تعرضت له من انتهاكات وتسخر من مخاوف رئيس الحكومة الجديد ومن مظهرها هي.
وكتبت "أعتذر لمظهري غير المرتب، ولكن عندما تدهم فرقة مكافحة الجريمة منزلك لاعتقالك في الليل، لن تفكر في تمشيط شعرك أو وضع مسحوق تجميل".
والآن، كلف المحقق نفسه الذي اعتقل أمي تلك الليلة بالتحقيق في مقتلها.
في اليوم الذي اغتيلت فيه، كانت أمي، دافني كاروانا غاليزيا، قد ذهبت إلى البنك لاستعادة حسابها الذي كان قد جمد بطلب من أحد وزراء الحكومة.
كانت قد بلغت الـ 53 من عمرها وكانت في قمة نشاطها الصحفي الذي امتد لثلاثين عاما.
ولكنها قُتلت في تلك الرحلة، إذ فجرت عن بعد عبوة ناسفة وزنها نصف كيلوغرام زُرعت تحت مقعد سيارتها.
احتفل مؤيدو الحكومة بعملية الاغتيال علنا، وهو أمر ذكرني بأولئك الذين فرحوا باغتيال الصحفي التركي الأرمني هرانت دينك.
وألمح آخرون إلى أني قد دبرت العملية، أو أن أمي خاطرت برضا بحياتها، وهو الاتهام نفسه الذي وجه الى الصحفي الأمريكي،جيمس فولي، الذي خطف وقتل في سوريا.
- تشرين الأول / أكتوبر 2017: الصحفية دافني كاروانا غاليزيا تُقتل في انفجار سيارة مفخخة
- رئيس الحكومة المالطية، جوزيف موسكات، يصف الاغتيال "بالبربري"، ولكن أسرة القتيلة تمنع الزعماء السياسيين المالطيين من حضور جنازتها
- كانون الأول / ديسمبر 2017: اعتقال 3 أشخاص والجهات المختصة تحقق في امكانية استخدام قتلة مأجورين في العملية
- تموز / يوليو 2018: تحقيق أجرته الحكومة المالطية يبرئ رئيس الحكومة وزوجته من شبهة الفساد التي أوردتها دافني كاروانا غاليزيا
- آب / أغسطس 2018: أسرة دافني كاروانا غاليزيا تطالب بتحقيق علني للتأكد من قدرة مالطا على منع اغتيالها.إن الانتشار الحر للمعلومات والآراء، الذي يقع في صلب عمل الصحفيين،
يخلق مجتمعات أكثر عدلا وحرية. وهذا ما قاله شقيقي أمام تجمع لديبلوماسيين
أوروبيين بعد اغتيال والدتي بفترة قصيرة وعندما كنا ما زلنا في فترة التأبين.
وقال "إنه يخلق مجتمعات أكثر ثراء ومرونة، أو بعبارة أخرى، مجتمعات تستحق أن يعيش المرء فيها".
بعد اغتيال والدتنا، كان عزاؤنا الوحيد هو الدعم والمساندة والحزن الذي شعرنا به من شتى الناس.
كان ذلك مفاجئا لي، وذكرني بقول لأحد الأصدقاء "الناس الجيدون موجودون في كل مكان. ما عليك إلا أن تبحث عنهم".
إن الرغبة في العيش في مجتمع حر ومنفتح، مجتمع يطبق فيه القانون على الجميع دون تمييز وتُحترم فيه حقوق الانسان، هي رغبة انسانية جامعة. ولكن ككثير من الرغبات تشهد هذه الرغبة مدا وجزرا بين الفينة والأخرى.
ولكن، وفي كثير من الأحيان، نستدرك بعد فوات الأوان أن الناس السيئين القليلين سيبقون معنا مثل الأمراض، ويسعون للسيطرة علينا.
إن المهمة التي كرسنا أنفسنا - أنا وأخوتي ووالدي - لها منذ اغتيال والدتي مهمة كبيرة وصعبة، إذ نريد أن نحصل على العدالة بعد مقتلها والعدالة في التحقيق، كما نريد ألا يحصل أمر مشابه في المستقبل.
ولا يوجد لدينا إلا القليل من الوقت لأي شيء آخر الآن.
ضمن أسرتنا، نتحدث بين الفينة والأخرى عن انعدام صبرنا من التقاعس والفتور الذي تقابل به قضيتنا، خصوصا من جانب المسؤولين.
ونجد صعوبة في الامتناع عن انتقاد كسلهم وعدم مبالاتهم.
قال لي أبناء الصحفي التركي، أوغور مومتشو، يوما إنه بعد اغتيال والدهم بعبوة ناسفة، برر مدير الشرطة إخفاق جهازه في منع الجريمة بالقول "لا نتمكن من عمل أي شيء، إذ نُواجه بجدار من الطابوق".
وكان رد والدتهم على ذلك القول: "أزيلوا طابوقة ثم أخرى حتى تزيلون الجدار كله".
وهذا الذي ما نعمله منذ اغتيال والدتنا.
كان المبدأ الذي يقودني منذ البداية هو عمل أفضل ما نستطيع عمله مهما كانت النتائج. وأعتقد الآن أن العملية بحد ذاتها لا تقل أهمية عن أهدافها.
فنحن نقود تغييرا ثقافيا ونخلق احتراما أكثر لحرية التعبير باسلوب لا يقل بساطة عن إجبار الدولة على القيام بواجبها في توفير العدالة.
وانضممنا إلى آخرين يحاولون إزالة مرض "انعدام الحرية"، ويعلمون العالم كيفية احترام حقوق الانسان.
قال لنا الكاتب، يامين رشيد، قبل 5 أيام فقط من مقتله طعنا خارج بيته في المالديف في عام 2017، "الحرية تبدأ بحرية الضمير".
وقال "بدون هذه حرية التفكير الأساسية هذه، ماذا عساك أن تفعله بالحريات الأخرى؟"
وكما مع اغتيال والدتي برهن اغتياله على أنه لا احترام لهذه الحريات في بلداننا.
المهمة ليست حكرا علينا، نحن أسر القتلى، للنضال في سبيل هذه الحريات. هذه المسؤولية أالقيت على عاتقنا ولكننا لن نتمكن من تحملها لوحدنا بل نحتاج إلى الناس الجيدين في كل مكان للانضمام الينا.
- بدأت الأمم المتحدة تخليد يوم حرية الصحافة العالمي في عام 1993
- شعار الاحتفال بالعيد هذا العام هو الصحافة والانتخابات في زمن الأخبار الكاذبة
- هدف الاحتفال باليوم العالمي لحرية الصحافة هو الدفاع عن أوضاع حرية الصحافة في العالم وتذكر الصحفيين الذين قضوا وهم يؤدون واجبهم.
- في العام الماضي، قتل 95 صحفيا وإعلاميا في عمليات اغتيال وتفجيرات وغيرها من الهجمات، حسبما يقول الاتحاد الدولي للصحفيينأعرف أن هناك المزيد منا. تذكروا أن الصحفي السعودي، جمال خاشقجي، كان محبوبا من قبل كثيرين في كل مكان.
ولكن كان يكفي أن يكرهه شخص واحد ليقتله.
وفي كل هذه الاغتيالات، بما فيها اغتيال والدتي، يغيب أي دليل على أن الدول تبذل أي جهود في سبيل مقاضاة المسؤولين عنها.
ولذا بدأنا بازالة الطابوقة الأولى: أي بالطلب من مالطا بأن تجري تحقيقا رسميا علنيا للتوصل إلى سبب إخفاقها في منع اغتيال واحدة من أبرز صحفياتها.
بعد ذلك، سننتقل إلى طابوقة أخرى.
أتمنى كل يوم أنه ما كان لوالدتي أن تضحي بحياتها في سبيل بلدها، وأن تكون عوضا عن ذلك على قيد الحياة.
ولكن، وكما قالت الصحفية الآذرية، خديجة اسماعيلوفا، التي وصفت منظمات حقوقية احتجازها بأنه "مروع"، "إذا كنا نحب فعلا، نريد من الذين نحبهم أن يكونوا كما هم". وهكذا كانت دافني، المقاتلة والبطلة.
الأمر الذي لن تعرف به أمي أن مقتلها ألهم الآلاف من الأفعال البطولية في مالطا وفي غيرها من البلدان.
وأريد أن أعتقد بأن كل هذه الأفعال البطولية قد حمت صحفيين شجعان بطريقة أو بأخرى من المصير الدامي الذي واجهته والدتي.
Thursday, March 28, 2019
بريكست: البرلمان البريطاني يفشل في التوصل إلى أغلبية بشأن خيارات الخروج من الاتحاد الأوروبي
فشل أعضاء مجلس العموم البريطاني في التوافق حول الخيارات الثمانية التي عرضت للتصويت للخروج من الاتحاد
الأوروبي (بريكست)، حيث لم يحصل أي خيار على الأغلبية اللازمة لاعتماده بعد
تصويت ظل حتى وقت متأخر الأربعاء.
وتم رفض اقتراح البقاء في الاتحاد الجمركي مع الاتحاد الأوروبي بأغلبية 272 صوتا مقابل 264 صوتا، بينما تم
رفض ابطال المادة 50 لتجنب لتجنب الخروج دون اتفاق بموافقة 184 صوتا مقابل 293 صوتا.وتوجت النتائج يوما حافلا بالدراما البريطانية بعد أن وعدت تيريزا ماي بالتنازل عن منصب رئيس الوزراء إذا تم تمرير صفقتها.
وصرح وزير شؤون الخروج ستيفن باركلي، أن النتائج عززت وجهة نظر الحكومة بأن صفقة رئيسة الوزراء تيريزا ماي كانت "الخيار الأفضل".
وقال للنواب إنه من الواضح أنه لا توجد "طريقة بسيطة للمضي قدما في الخروج".
أما عن خطة حزب العمل البديلة للخروج، والتي تشمل "التوافق الوثيق" مع السوق الموحدة وحماية حقوق العمال، فقد فشلت في الحصول على تأييد البرلمان وتم رفضها بأغلبية 307 أصوات مقابل 237 صوتا.
وفشلت خمسة مقترحات أخرى في الحصول على تأييد النواب، بما في ذلك دعم الخروج دون اتفاق، أو ما يسمى بخطة 2.0، وكذلك اقتراح البقاء في المنطقة الاقتصادية الأوروبية وأيضا مقترح لوقف عملية خروج بريطانيا من الاتحاد الأوروبي عن طريق إبطال المادة 50.
وأدى التعثر في تحديد طريق واضح للخروج من المأزق الحالي إلى مشاحنات غاضبة في مجلس العموم مع انتقاد العملية قائلين إنها كانت "فشلا ذريعا".
وقال النائب المحافظ السير أوليفر ليتوين، الذي أشرف على العملية غير المسبوقة للأصوات الإرشادية، إن عدم وجود أغلبية لأي اقتراح "مخيب للآمال".
- الخروج من الاتحاد الاوروبي دون أي اتفاق
- عضوية السوق المشتركة
- السوق المشتركة دون وحدة جمركية
- عضوية الاتحاد الجمركي الاوروبي
- إلغاء المادة 50 والبريكست برمته والاستمرار في عضوية الاتحاد الأوروبي
- عرض أي اتفاق مستقبلي على التصويت الشعبي
وكان الاتحاد الأوروبي قد وافق على تأجيل موعد خروج بريطانيا الذي كان مقررا في التاسع والعشرين من الشهر الجاري حسب المادة 50 من معاهدة لشبونة.
وصوت البرلمان لصالح تأجيل الخروج إلى 12 أبريل/نيسان أو 22 مايو/آيار من العام.
لكنه دعا إلى السماح للنواب بالتصويت مرة أخرى، يوم الاثنين، واستطرد قائلا إن هذا لن يكون ضروريا إذا تمت الموافقة على صفقة رئيس الوزراء قبل ذلك.
وقالت آنا سوبري، نائبة المجموعة المستقلة، إن عدد الأشخاص الذين صوتوا لصالح فكرة استفتاء آخر أكثر من الذين صوتوا لصالح صفقة رئيسة الوزراء تيريزا ماي، في المرة التي تم عرضها على البرلمان.
وقالت النائبة العمالية مارغريت بيكيت، التي تقدمت بطلب إجراء استفتاء مؤكد، إن الهدف لم يكن تحديد اقتراح واحد في هذه المرحلة، بل الحصول على إحساس بالمكان الذي قد يكمن فيه حل وسط، على حد تعبيرها، "ولنترك ألف زهرة تتفتح".
وقال رئيس مجلس العموم جون بيركو، إن العملية التي وافق عليها مجلس النواب سمحت بمرحلة نقاش ثانية يوم الاثنين، ولا يوجد سبب يدعو إلى عدم الاستمرار فيها.
وفي وقت سابق قبل التصويت، تعهدت رئيسة الوزراء البريطانية تيريزا ماي أمام أعضاء حزبها بالتخلي عن منصبها في حال ما دعموا الاتفاق الخاص بخروج البلاد من الاتحاد الأوروبي.
وقالت ماي لنواب حزب المحافظين " أنا مستعدة للتخلي عن منصبي في وقت أبكر مما كنت اعتزم فيه الرحيل من أجل القيام بما يخدم صالح البلاد والحزب"
جدير بالذكر أن نتائج التصويت غير ملزمة للحكومة لكنها تعطي المؤشرات على الخيار لذي يمكن أن يحظى بالأغلبية في حال اجراء تصويت ملزم في المستقبل القريب.
Thursday, February 21, 2019
ترامب يؤكد منع المرأة التي التحقت بتنظيم الدولة الإسلامية من العودة إلى أمريكا
قال الرئيس الأمريكي، دونالد ترامب، إن المرأة، التي غادرت الولايات
المتحدة لتعمل في الدعاية لتنظيم الدولة الإسلامية، لن يسمح لها بالعودة إلى البلاد.
وكتب على موقع توتير أنه: أعطى التعليمات إلى وزير الخارجية، مايك بومبيو، بعدم السماح لهدى مثنى بالعودة إلى الولايات المتحدة.
وقال بومبيو في وقت سابق إن المرأة، البالغة من العمر 24 عاما، ليست أمريكية، ولن يسمح لها بدخول الولايات المتحدة.
ولكن عائلتها تؤكد، وكذلك محاميها، بأنها تحمل الجنسية الأمريكية.
وسافرت هدى، التي نشأت في ألاباما، إلى سوريا، وعمرها 20 عاما، من أجل الالتحاق بتنظيم الدولة الإسلامية، وقالت لعائلتها إنها ذاهبة إلى تركيا لحضور نشاط جامعي.
وتشبه حالتها حالة شميمة بيغوم التي سحبت منها الجنسية البريطانية.
وسافرت شميمة إلى سوريا في عام 2015 بهدف الالتحاق بتنظيم الدولة الإسلامية، ولكنها اليوم تريد العودة إلى بريطانيا.
وكان الرئيس الأمريكي طالب بريطانيا ودولا أوروبية أخرى باستقبال مواطنيها المقاتلين السابقين في صفوف تنظيم الدولة الإسلامية، الذين أسروا في المعارك الأخيرة، ومحاكمتهم.
وحذر من أن المليشيا الكردية، التي تدعمها الولايات المتحدة، ستفرج عنهم.
وقال محامي عائلة مثنى، حسن شبلي، إن ترامب "يناقض نفسه" عندما يطلب من الدول الأوروبية استقبال مواطنيها المقاتلين السابقين في صفوف تنظيم الدولة الإسلامية، ثم "يحاول التلاعب" عندما يتعلق الأمر بالمواطنين الأمريكيين.
وأضاف المحامي في تصريح لقناة سي بي أس إن: "إدارة ترامب تواصل محاولاتها سحب الجنسية الأمريكية من مواطنين أمريكيين، دون وجه حق".
وذكر أن هدى "تملك جواز سفر أمريكي وهي مواطنة أمريكية، ولدت في هكنسيك بولاية نيوجيرسي، في أكتوبر/ تشرين الأول 1994 شهورا بعد تخلي والدها عن وظيفته الدبلوماسية".
ولكن بومبيو يقول إنها "لا تملك جواز سفر أمريكي صحيح الصلاحية، ولا حق لها في الحصول على جواز سفر، ولا حق لها في الحصول على تأشيرة لدخول الولايات المتحدة".
وأضاف في بيان: "هدى مثنى ليست مواطنة أمريكية، ولن يسمح لها بدخول الولايات المتحدة".
وتقول هدى إنها طلبت جواز سفر أمريكي، وحصلت عليه، قبل السفر إلى تركيا.
وجاء في صحيفة نيويورك تايمز أنها ظهرت في صور فيديو لتنظيم الدولة الإسلامية وهي تحمل جواز سفر أمريكي".
ويقول محللون إن الإدارة الأمركية ترتكز في موقفها من الجنسية أن والد هدى كان دبلوماسيا يمنيا، والأطفال الذين يولدون في الولايات المتحدة لدبلوماسيين أجانب لا يحصلون على الجنسية بصفة آلية. ولكن المحامي يقول إنها ولدت بعدما تخلى والدها عن الوظيفة الدبلوماسية.
وتقول هدى، التي أنجبت طفلا عمره الآن 18 شهرا، إنها ندمت على الالتحاق بتنظيم الدولة الإسلامية وطلبت الصفح عن صور الفيديو التي انتشرت لها على مواقع التواصل الاجتماعي تروج فيها لتنظيم.
ويعتقد أنها سلمت نفسها للمليشيا الكردية المدعومة أمريكيا، وتعيش حاليا في مخيم شمالي سوريا.
وكتب على موقع توتير أنه: أعطى التعليمات إلى وزير الخارجية، مايك بومبيو، بعدم السماح لهدى مثنى بالعودة إلى الولايات المتحدة.
وقال بومبيو في وقت سابق إن المرأة، البالغة من العمر 24 عاما، ليست أمريكية، ولن يسمح لها بدخول الولايات المتحدة.
ولكن عائلتها تؤكد، وكذلك محاميها، بأنها تحمل الجنسية الأمريكية.
وسافرت هدى، التي نشأت في ألاباما، إلى سوريا، وعمرها 20 عاما، من أجل الالتحاق بتنظيم الدولة الإسلامية، وقالت لعائلتها إنها ذاهبة إلى تركيا لحضور نشاط جامعي.
وتشبه حالتها حالة شميمة بيغوم التي سحبت منها الجنسية البريطانية.
وسافرت شميمة إلى سوريا في عام 2015 بهدف الالتحاق بتنظيم الدولة الإسلامية، ولكنها اليوم تريد العودة إلى بريطانيا.
وكان الرئيس الأمريكي طالب بريطانيا ودولا أوروبية أخرى باستقبال مواطنيها المقاتلين السابقين في صفوف تنظيم الدولة الإسلامية، الذين أسروا في المعارك الأخيرة، ومحاكمتهم.
وحذر من أن المليشيا الكردية، التي تدعمها الولايات المتحدة، ستفرج عنهم.
وقال محامي عائلة مثنى، حسن شبلي، إن ترامب "يناقض نفسه" عندما يطلب من الدول الأوروبية استقبال مواطنيها المقاتلين السابقين في صفوف تنظيم الدولة الإسلامية، ثم "يحاول التلاعب" عندما يتعلق الأمر بالمواطنين الأمريكيين.
وأضاف المحامي في تصريح لقناة سي بي أس إن: "إدارة ترامب تواصل محاولاتها سحب الجنسية الأمريكية من مواطنين أمريكيين، دون وجه حق".
وذكر أن هدى "تملك جواز سفر أمريكي وهي مواطنة أمريكية، ولدت في هكنسيك بولاية نيوجيرسي، في أكتوبر/ تشرين الأول 1994 شهورا بعد تخلي والدها عن وظيفته الدبلوماسية".
ولكن بومبيو يقول إنها "لا تملك جواز سفر أمريكي صحيح الصلاحية، ولا حق لها في الحصول على جواز سفر، ولا حق لها في الحصول على تأشيرة لدخول الولايات المتحدة".
وأضاف في بيان: "هدى مثنى ليست مواطنة أمريكية، ولن يسمح لها بدخول الولايات المتحدة".
وتقول هدى إنها طلبت جواز سفر أمريكي، وحصلت عليه، قبل السفر إلى تركيا.
وجاء في صحيفة نيويورك تايمز أنها ظهرت في صور فيديو لتنظيم الدولة الإسلامية وهي تحمل جواز سفر أمريكي".
ويقول محللون إن الإدارة الأمركية ترتكز في موقفها من الجنسية أن والد هدى كان دبلوماسيا يمنيا، والأطفال الذين يولدون في الولايات المتحدة لدبلوماسيين أجانب لا يحصلون على الجنسية بصفة آلية. ولكن المحامي يقول إنها ولدت بعدما تخلى والدها عن الوظيفة الدبلوماسية.
وتقول هدى، التي أنجبت طفلا عمره الآن 18 شهرا، إنها ندمت على الالتحاق بتنظيم الدولة الإسلامية وطلبت الصفح عن صور الفيديو التي انتشرت لها على مواقع التواصل الاجتماعي تروج فيها لتنظيم.
ويعتقد أنها سلمت نفسها للمليشيا الكردية المدعومة أمريكيا، وتعيش حاليا في مخيم شمالي سوريا.
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